शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

नसीर तुराबी


मिलने की तरह मुझ से वो पल भर नहीं मिलता

दिल उस से मिला जिस से मुक़द्दर नहीं मिलता

ये राह-ए-तमन्ना है यहाँ देख के चलना

इस राह में सर मिलते हैं पत्थर नहीं मिलता

हमरंगी-ए-मौसम के तलबगार होते

साया भी तो क़ामत के बराबर नहीं मिलता

कहने को ग़म-ए-हिज्र बड़ा दुश्मन-ए-जाँ है

पर दोस्त भी इस दोस्त से बेहतर नहीं मिलता

कुछ रोज़ 'नसीर' आओ चलो घर में रहा जाए

लोगों को ये शिकवा है कि घर पर नहीं मिलता

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